कुछ लिखने की बानगी की है मैंने
Sunday, August 25, 2013
Wednesday, August 3, 2011
कुछ नया
Friday, March 18, 2011
वक्त
डायरी जब वो ग्यारह बारह साल के रहे होंगे तब से लिखी गयी थी ।
पेज नम्बर ०१ पर लिखा गया था " पतंग उड़ानी थी फिर उड़ा लूँगा होमवर्क निपटा लूं पहले "
पेज नम्बर ०२ " सारे बच्चे बारिश में खेल रहे हैं मैं भी खेलना चाहता हूँ पर परीछा सर पर है "
पेज नम्बर ११४ " दोस्तों के साथ पिक्चर जाने का प्लान बना था पर जा नहीं पाया अस्सिंमेंट पूरे करने थे "
पेज नम्बर १३२ "राखी पर दीदी के पास जाना था पर ऑफिस के काम में फंसा हूँ "
पेज नम्बर १५५ " बीबी को घुमाने ले जाना था पर इस साल नहीं हो पायेगा "
पेज १८५ " आज कौशिकी ने साथ खेलने की जिद करी अगले रविवार जरूर खेलूँगा "
पेज २४० " कुछ दिनों से सोंच रहा था की गावं जा कर माँ बाबूजी से मिल आऊँ , अगले साल चला जाऊँगा "
पेज ३०२ " आजकल तबियत कुछ खराब चल रही है सोंच रहा हूँ डाक्टर को दिखा आऊँ , अगले हफ्ते जाऊँगा पक्का "..........................................
आगे के पन्ने खाली हैं .....................
जिंदगी में एक बार तो सब लौट सकता है पर गुजरा हुआ वक्त नहीं । ...
Friday, November 19, 2010
कफ़न फाड़ कर मुर्दा बोला
दमड़ी नहीं समाज दे सका
गज भर भी न वसन ढंकने को
निर्दय उभरी लाज दे सका
मुखड़ा सटक गया घुटनों में
अटक कंठ में प्राण राह गए
सिकुड़ गया तन जैसे मन में
सिकुड़ सब अरमान राह गए
मिली आग लेकिन न भाग्य सा
जलने को जुट पाया इंधन
दांतों के मिस प्रकट हो गया
मेरा कठिन शिशिर का क्रंदन
किन्तु अचानक लगा की यह
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया
श्वेत मांग सी विधवा की
चदरी कोई इन्सान दे गया
और दूसरा बिन मांगे ही
ढेर लकड़ियाँ दान दे गया
वस्त्र मिल गया ठण्ड मिट गयी
धन्य हुआ मानव का चोला
कफ़न फाड़ कर मुर्दा बोला
कहते मरे रहीम न लेकिन
पेट पीठ मिल एक हो सके
नहीं अश्रु से आज तलक हम
अमिट छुधा का दाग धो सके
खाने को कुछ नहीं मिला सो
खाने को गम मिले हजारों
श्री संपन्न नगर ग्रामों में
भूखे बेदम मिले हजारों
दाने दाने पर पाने वाले
का सुनता नाम लिखा है
किन्तु देखता हूँ इन पर
ऊँचा से ऊँचा दाम लिखा है
दास मलूका से पूंछो क्या
" सबके दाता राम" लिखा है ?
या की गरीबों की खातिर
भूखों मरना अंजाम लिखा है ?
किन्तु अचानक लगा के यह
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया
जुटा जुटा कर रेजगारियाँ
भोज मनाने बंधू चल पड़े
जहाँ न थी कल थी बूँद दिखती
वहां उमड़ते सिन्धु चल पड़े
निर्धन के घर हाथ सुखाते
नहीं किसी का अंतर डोला
कफ़न फाड़ कर मुर्दा बोला
घरवालों के आस पास से
मैंने केवल दो कण माँगा
किन्तु मिला कुछ नहीं और
में बे पानी ही मरा अभागा
जीते जी तो नल के जल से
भी अभिषेक किया न किसी ने
रहा अपेछित सदा निराद्रत
कुछ भी ध्यान दिया न किसी ने
बाप तरसता रहा की बेटा
श्रद्धा के दो घूँट पिला दे
स्नेह लता जो सूख रही है
जरा प्यार से उसे जिला दे
कहाँ श्रवन ? युग के दशरथ ने
एक एक को मार गिराया
मन मृग भोला रहा भटकता
निकली सब कुछ लू की माया ॥
लीक पर वे चलें जिनके
हमें तो जो हमारी यात्रा से बनें ऐसे अनिर्मित पंथ प्यारे हैं
Thursday, February 18, 2010
समाज
Saturday, January 30, 2010
क्षमा
Tuesday, January 12, 2010
प्रेम की विवशता
तुम किसी को प्रेम करो तो तुम स्वयं को असहाय पाते हो, किसी को घृणा करो तो तुम कुछ कर पाते हो। किसी को प्रेम करो तो तुम स्वयं को पूर्ण रूप से विवश पाते हो, क्योंकि तुम क्या कर सकते हो? जो भी तुम कर सकते हो वह तुम्हें तुच्छ और अर्थहीन लगता है; यह कभी भी काफी नहीं लगता। कुछ भी नहीं किया जा सकता, और जब व्यक्ति को यह एहसास होता है कि कुछ भी नहीं किया जा सकता तो उसे यह महसूस होता है कि वह विवश है। जब व्यक्ति सब कुछ करना चाहता है और उसे एहसास होता है कि कुछ भी नहीं किया जा सकता तो मन थम जाता है। इस विवशता में समर्पण घटता है। तुम खाली हो जाते हो। यही कारण है कि प्रेम गहरा ध्यान बन जाता है।
जिस व्यक्ति को तुमने गहराई से प्रेम किया है, उसकी मृत्यु के क्षण तुम्हें तुम्हारी मृत्यु की याद दिलाते हैं । मृत्यु का क्षण एक महान रहस्योद्घाटन का समय है। यह तुम्हें अहसास दिलाता है कि तुम नपुंसक और विवश हो। यह तुम्हें अहसास दिलाता है कि तुम हो ही नहीं। तुम्हारे होने का धोखा मिट जाता है।
कोई भी विचलित हो जायेगा क्योंकि अचानक तुम पाते हो कि तुम्हारे पांओं तले से ज़मीन खिसक गयी है। तुम कुछ भी नहीं कर पाते। कोई जिसे तुम प्रेम करते हो, मर रहा है। तुम शाहोगे कि तुम उसे अपना जीवन दे दो लेकिन तुम ऐसा कर नहीं सकते। कुछ भी नहीं हो सकता। व्यक्ति नितांत निर्बल सा प्रतीक्षा करता रहता है।
वह घड़ी तुम्हें अवसाद से भर जाती है। वह घड़ी तुम्हें उदास कर सकती है या फिर तुम्हें सत्य की एक महान यात्रा पर ले जा सकती है.... खोज की एक महान यात्रा। यह जीवन क्या है? यदि मृत्यु आकर इसे ले जा सकती है तो यह जीवन क्या है? इसका क्या अर्थ है यदि व्यक्ति मृत्यु के खिलाफ इतना नपुंसक है? और स्मरण रहे हर कोई अपनी मृत्युशय्या पर है। जीवनोपरांत हर कोई अपनी मृत्युशय्या पर है। दूसरा कोई रास्ता नहीं है। सब बिस्तर मृत्युशय्या हैं, क्योंकि जन्म के बाद एक ही बात निश्चित है और वह है मृत्यु।
कोई आज मरता है, कोई कल , कोई परसों: मूलत: फर्क क्या है? समय कोई खास फर्क नहीं डालता। समय केवल जीवन का भ्रम पैदा करता है लेकिन वह जीवन जिसका अंत मृत्यु में हो, वास्तविक जीवन नहीं है। निस्संदेह यह स्वप्न होगा।
जीवन केवल तभी प्रामाणिक है जब यह शाश्वत हो। अन्यथा स्वप्न में और जिसे तुम जीवन कहते हो उसमें क्या अंतर है? रात्रि में, गहरी निद्रा में एक स्वप्न उतना ही सत्य होता है जितना कुछ और, उतना ही वास्तविक-बल्कि उससे भी अधिक वास्तविक जो तुम खुली आंखों से देखते हो। सुबह होते ही यह विलीन हो जाता है , कोई चिंह नहीं बचता। सुबह जब तुम उठते हो तो पाते हो कि यह एक स्वप्न था, सत्य नहीं।
जीवन का यह स्वप्न कुछ वर्षों तक चलता है, फिर अचानक व्यक्ति जागता है और पूरा जीवन एक स्वप्न सिद्ध होता है। मृत्यु एक महान रहस्योद्घाटन है। यदि मृत्यु न होती तो कोई धर्म न होता। यह मृत्यु ही है जिसके कारण धर्म का अस्तित्व है। यह मृत्यु ही है जिसके कारण बुद्ध का जन्म हुआ। सब बुद्धों का जन्म मृत्यु के बोध के कारण होता है।
जब तुम किसी मरते हुए व्यक्ति के पास जाकर बैठो तो अपने लिये अफसोस करना। तुम भी उसी नाव में हो, तुम्हारी भी वही परिस्थिति है। मृत्यु एक दिन तुम्हारे द्वार पर भी दस्तक देगी। तैयार रहना। इससे पहले कि मृत्यु दस्तक दे, घर लौट आओ। बीच में ही मत पकड़े जाना, अन्यथा यह पूरा जीवन एक स्वप्न की भांति विलीन हो जाता है और तुम स्वयं को अत्यंत दीन पाते हो, आंतरिक रूप में दीन।
जीवन, वास्तविक जीवन, कभी नहीं मरता। फिर मरता कौन है? तुम मरते हो। "मैं" मरता है, अहं मरता है। अहंकार मृत्यु का हिस्सा है; जीवन नहीं। तो यदि तुम अहंकारशून्य हो सकते हो, तो मृत्यु तुम्हें कभी न मार पायेगी। यदि तुम सचेतन रूप में अहंकार को गिरा सकते हो तो तुमने मृत्यु पर विजय पा ली। यदि तुम सचमुच जागरूक हो तो तुम इसे एक क्षण में गिरा सकते हो। तयदि तुम इतने जागरूक नहीं तो तुम इसे धीरे- धीरे गिरा सकते हो। यह तुम पर निर्भर करता है। लेकिन एक बात निश्चित है: अहंकार को गिराना ही होगा। अहंकार के मिटते ही मृत्यु तिरोहित हो जाती है। अहंकार के गिरते ही मृत्यु भी गिर जाती है।
मरते हुए व्यक्ति के लिये अफसोस मत करो, अपने लिये अफसोस करो। मृत्यु को तुम्हें घेर लेने दो। इसका स्वाद चखो। अहसास करो कि तुम असहाय हो, नपुंसक हो। कौन असहाय महसूस कर रहा है, और कौन नपुंसक महसूस कर रहा है? अहंकार-क्योंकि तुम पाते हो कि तुम कुछ नहीं कर सकते। तुम उसकी सहायता करना चाहते हो परंतु कर नहीं पाते। तुम चाहते हो कि वो जीवित रहे लेकिन कुछ भी नहीं किया जा सकता।
इस नपुंसकता को जितनी गहराई से हो सके महसूस करो और इस विवशता से एक प्रकार की जागरूकता, एक प्रर्थना और ध्यान उठेगा। व्यक्ति की मृत्यु को सीढ़ी बनाओ, यह एक अवसर है। हर बात को अवसर बना लो।
उनके पास बैठो। मौन बैठो और ध्यान करो। उनकी मृत्यु को एक दिशा निर्देश होने दो ताकि तुम अपने जीवन को व्यर्थ न गंवाते रहो। यही तुम्हारे साथ भी होने वाला है।
सभी प्रेम चाहते हैँ फिर भी प्रेम का अकाल क्योँ है?
मैं आपको एक सूत्र की बात कहूं: जिस मनुष्य के पास प्रेम है उसकी प्रेम की मांग मिट जाती है। और यह भी मैं आपको कहूं: जिसकी प्रेम की मांग मिट जाती है वही केवल प्रेम को दे सकता है। जो खुद मांग रहा है वह दे नहीं सकता है।
इस जगत में केवल वे लोग प्रेम दे सकते हैं जिन्हें आपके प्रेम की कोई अपेक्षा नहीं है—केवल वे ही लोग! महावीर और बुद्ध इस जगत को प्रेम देते हैं। जिनको हम समझ ही नहीं पाते। हम सोचते हैं, वे तो प्रेम से मुक्त हो गए हैं। वे ही केवल प्रेम दे रहे हैं। आप प्रेम से बिलकुल मुक्त हैं। क्योंकि उनकी मांग बिलकुल नहीं है। आपसे कुछ भी नहीं मांग रहे हैं, सिर्फ दे रहे हैं।
प्रेम जहां लेन-देन है, वहां बहुत जल्दी घृणा में परिणत हो सकता है, क्योंकि वहां प्रेम है ही नहीं। लेकिन जहां प्रेम केवल देना है, वहां वह शाश्वत है, वहां वह टूटता नहीं। वहां कोई टूटने का प्रश्न नहीं, क्योंकि मांग थी ही नहीं। आपसे कोई अपेक्षा न थी कि आप क्या करेंगे तब मैं प्रेम करूंगा। कोई कंडीशन नहीं थी। प्रेम हमेशा अनकंडीशनल है। कर्तव्य, उत्तरदायित्व, वे सब अनकंडीशनल हैं, वे सब प्रेम के रूपांतरण हैं।
तो मैं आपसे नहीं कहता आप कैसे कर्तव्य निभाएं। जब आपको यह खयाल ही उठ आया है कि कैसे कर्तव्य निभाएं, तो आप पक्का समझ लें, आपके भीतर कोई प्रेम नहीं है। तो मैं आपसे यह कहूंगा—प्रेम कैसे पैदा हो जाए।
और यह भी आपको इस सिलसिले में कह दूं कि प्रेम केवल उस आदमी में होता है जिसको आनंद उपलब्ध हुआ हो। जो दुखी हो, वह प्रेम देता नहीं, प्रेम मांगता है, ताकि दुख उसका मिट जाए। आखिर प्रेम की मांग क्या है? सारे दुखी लोग प्रेम चाहते हैं। वे प्रेम इसलिए चाहते हैं कि वह प्रेम मिल जाएगा तो उनका दुख मिट जाएगा, दुख भूल जाएगा। प्रेम की आकांक्षा भीतर दुख के होने का सबूत है। तो फिर प्रेम वह दे सकेगा जिसके भीतर दुख नहीं है। जिसके भीतर कोई दुख नहीं है, जिसके भीतर केवल आनंद रह गया है, वह आपको प्रेम दे सकेगा।
अब अगर मेरी बात ठीक से समझें: दुख भीतर हो तो उसका प्रकाशन प्रेम की मांग में होता है और आनंद भीतर हो तो उसका प्रकाशन प्रेम के वितरण में होता है। प्रेम जो है आनंद का प्रकाश है। तो जो आदमी भीतर आनंद से भरेगा उसके जीवन के चारों तरफ प्रेम विकीर्ण हो जाएगा। जो भी उसके निकट आएगा उसे प्रेम उपलब्ध होगा। जो भी उसके करीब होगा उसका कर्तव्य पूरा हो जाएगा, उसका उत्तरदायित्व निभेगा। और उस आनंद के लिए तो मैं आपसे कहा कि अगर मैं कहूं कि प्रेम आनंद का प्रकाश है, तो आनंद आत्मबोध का अनुभव है, उसके पूर्व नहीं है। दुख है कि हम अपने को नहीं जानते, अपने को नहीं जानते इसलिए प्रेम मांगते हैं। अगर हम अपने को जानेंगे, आनंद होगा; आनंद होगा तो प्रेम हमसे विकीर्ण होगा।
Wednesday, January 6, 2010
व्यक्तियों को वस्तु मत बनाओ
मैं किसी को प्रेम करता हूं, तो चाहता हूं कि कल भी मेरा प्रेम कायम रहे; तो चाहता हूं कि जिसने मुझे आज प्रेम दिया, वह कल भी मुझे प्रेम दे। अब कल का भरोसा सिर्फ वस्तु का किया जा सकता है, व्यक्ति का नहीं किया जा सकता। कल का भरोसा वस्तु का किया जा सकता है। कुर्सी मैंने जहां रखी थी अपने कमरे में, कल भी वहीं मिल सकती है। प्रेडिक्टेबल है, उसकी भविष्यवाणी हो सकती है। और रिलायबल है, उस पर निर्भर रहा जा सकता है। क्योंकि मुर्दा कुर्सी की अपनी कोई चेतना, अपनी कोई स्वतंत्रता नहीं है। लेकिन जिसे मैंने आज प्रेम किया, कल भी उसका प्रेम मुझे ऐसा ही मिलेगा-अगर व्यक्ति जीवंत है और चेतना है, तो पक्का नहीं हुआ जा सकता। हो भी सकता है, न भी हो। लेकिन मैं चाहता हूं कि नहीं, कल भी यही हो जो आज हुआ था। तो फिर मुझे कोशिश करनी पड़ेगी कि यह व्यक्ति को मिटा कर मैं वस्तु बना लूं। तो फिर रिलायबल हो जाएगा।
तो फिर मैं अपने प्रेमी को पति बना लूं या प्रेयसी को पत्नी बना लूं। कानून का, समाज का सहारा ले लूं। और कल सुबह जब मैं प्रेम की मांग करूं, तो वह पत्नी या वह पति इनकार न कर पाएगा। क्योंकि वादे तय हो गए हैं, समझौता हो गया है; सब सुनिश्चित हो गया है। अब मुझे इनकार करना मुझे धोखा देना है; वह कर्तव्य से च्युत होना है। तो जिसे मैंने कल के प्रेम में बांधा, उसे मैंने वस्तु बनाया। और अगर उसने जरा सी भी चेतना दिखाई और व्यक्तित्व दिखाया, तो अड़चन होगी, तो संघर्ष होगा, तो कलह होगी।
इसलिए हमारे सारे संबंध कलह बन जाते हैं। क्योंकि हम व्यक्तियों से वस्तुओं जैसी अपेक्षा करते हैं। बहुत कोशिश करके भी कोई व्यक्ति वस्तु नहीं हो पाता, बहुत कोशिश करके भी नहीं हो पाता। हां, कोशिश करता है, उससे जड़ होता चला जाता है। फिर भी नहीं हो पाता; थोड़ी चेतना भीतर जगती रहती है, वह उपद्रव करती रहती है। फिर सारा जीवन उस चेतना को दबाने और उस पदार्थ को लादने की चेष्टा बनती है।
और जिस व्यक्ति को भी मैंने दबा कर वस्तु बना दिया, या किसी ने दबा कर मुझे वस्तु बना दिया, तो एक दूसरी दुर्घटना घटती है, कि अगर सच में ही कोई बिलकुल वस्तु बन जाए, तो उससे प्रेम करने का अर्थ ही खो जाता है। कुर्सी से प्रेम करने का कोई अर्थ तो नहीं है। आनंद तो यही था कि वहां चैतन्य था। अब यह मनुष्य का डाइलेमा है, यह मनुष्य का द्वंद्व है, कि वह चाहता है व्यक्ति से ऐसा प्रेम, जैसा वस्तुओं से ही मिल सकता है। और वस्तुओं से प्रेम नहीं चाहता, क्योंकि वस्तुओं के प्रेम का क्या मतलब है? एक ऐसी ही असंभव संभावना हमारे मन में दौड़ती रहती है कि व्यक्ति से ऐसा प्रेम मिले, जैसा वस्तु से मिलता है। यह असंभव है। अगर वह व्यक्ति व्यक्ति रहे, तो प्रेम असंभव हो जाएगा; और अगर वह व्यक्ति वस्तु बन जाए, तो हमारा रस खो जाएगा। दोनों ही स्थितियों में सिवा फ्रस्ट्रेशन और विषाद के कुछ हाथ न लगेगा।
और हम सब एक-दूसरे को वस्तु बनाने में लगे रहते हैं। हम जिसको परिवार कहते हैं, समाज कहते हैं, वह व्यक्तियों का समूह कम, वस्तुओं का संग"ह ज्यादा है। यह जो हमारी स्थिति है, इसके पीछे अगर हम खोजने जाएं, तो लाओत्से जो कहता है, वही घटना मिलेगी। असल में, जहां है नाम, वहां व्यक्ति विलीन हो जाएगा, चेतना खो जाएगी और वस्तु रह जाएगी। अगर मैंने किसी से इतना भी कहा कि मैं तुम्हारा प्रेमी हूं, तो मैं वस्तु बन गया। मैंने नाम दे दिया एक जीवंत घटना को, जो अभी बढ़ती और बड़ी होती, फैलती और नई होती। और पता नहीं, कैसी होती! कल क्या होता, नहीं कहा जा सकता था। मैंने दिया नाम, अब मैंने सीमा बांधी। अब मैं कल रोकूंगा, उससे अन्यथा न होने दूंगा जो मैंने नाम दिया है।
कल सुबह जब मेरे ऊपर क्रोध आएगा, तो मैं कहूंगा, मैं प्रेमी हूं, मुझे क्रोध नहीं करना चाहिए। तो मैं क्रोध को दबाऊंगा। और जब क्रोध आया हो और क्रोध दबाया गया हो, तो जो प्रेम किया जाएगा, वह झूठा और थोथा हो जाएगा। और जो प्रेमी क्रोध करने में समर्थ नहीं है, वह प्रेम करने में असमर्थ हो जाएगा। क्योंकि जिसको मैं इतना अपना नहीं मान सकता कि उस पर क्रोध कर सकूं, उसको इतना भी कभी अपना न मान पाऊंगा कि उसे प्रेम कर सकूं।
लेकिन मैंने कहा, मैं प्रेमी हूं! तो कल जो सुबह क्रोध आएगा, उसका क्या होगा अब? उस वक्त मुझे धोखा देना पड़ेगा। या तो मैं क्रोध को पी जाऊं, दबा जाऊं, छिपा जाऊं, और ऊपर प्रेम को दिखलाए चला जाऊं। वह प्रेम झूठा होगा, क्रोध असली होगा। असली भीतर दबेगा, नकली ऊपर इकट्ठा होता चला जाएगा। तब फिर मैं एक झूठी वस्तु हो जाऊंगा, एक व्यक्ति नहीं। और यह जो भीतर दबा हुआ क्रोध है, यह बदला लेगा। यह रोज-रोज धक्के देगा, यह रोज-रोज टूट कर बाहर आना चाहेगा। और तब स्वभावतः, जिसे प्रेम किया है, उससे ही बचने की चेष्टा चलने लगेगी।
Friday, January 1, 2010
प्रेम, अकेलापन और एकांत
Tuesday, November 17, 2009
प्यार का सच
जाता है। और जितना प्रेम कम होता है, उतना सेक्स ज्यादा हो जाता है। जिस आदमी में जितना ज्यादा प्रेम होगा, उतना
उसमें सेक्स विलीन हो जाएगा। अगर आप परिपूर्ण प्रेम से भर जाएंगे, आपके भीतर सेक्स जैसी कोई चीज नहीं रह जाएगी।
और अगर आपके भीतर कोई प्रेम नहीं है, तो आपके भीतर सब सेक्स है।
सेक्स की जो शक्ति है, उसका परिवर्तन, उसका उदात्तीकरण प्रेम में होता है। इसलिए अगर सेक्स से मुक्त होना है, तो
सेक्स को दबाने से कुछ भी न होगा। उसे दबाकर कोई पागल हो सकता है। और दुनिया में जितने पागल हैं, उसमें से सौ में
से नब्बे संख्या उन लोगों की है, जिन्होंने सेक्स की शक्ति को दबाने की कोशिश की है। और यह भी शायद आपको पता होगा
कि सभ्यता जितनी विकसित होती है, उतने पागल बढ़ते जाते हैं, क्योंकि सभ्यता सबसे ज्यादा दमन सेक्स का करवाती है।
सभ्यता सबसे ज्यादा दमन, सप्रेशन सेक्स का करवाती है! और इसलिए हर आदमी अपने सेक्स को दबाता है, सिकोड़ता
है। वह दबा हुआ सेक्स विक्षिप्तता पैदा करता है, अनेक बीमारियां पैदा करता है, अनेक मानसिक रोग पैदा करता है।
सेक्स को दबाने की जो भी चेष्टा है, वह पागलपन है। ढेर साधु पागल होते पाए जाते हैं। उसका कोई कारण नहीं है सिवाय
इसके कि वे सेक्स को दबाने में लगे हुए हैं। और उनको पता नहीं है, सेक्स को दबाया नहीं जाता। प्रेम के द्वार खोलें, तो
जो शक्ति सेक्स के मार्ग से बहती थी, वह प्रेम के प्रकाश में परिणत हो जाएगी। जो सेक्स की लपटें मालूम होती थीं, वे प्रेम
का प्रकाश बन जाएंगी। प्रेम को विस्तीर्ण करें। प्रेम सेक्स का क्रिएटिव उपयोग है, उसका सृजनात्मक उपयोग है। जीवन को
प्रेम से भरें।
आप कहेंगे, हम सब प्रेम करते हैं। मैं आपसे कहूं, आप शायद ही प्रेम करते हों; आप प्रेम चाहते होंगे। और इन दोनों में
जमीन-आसमान का फर्क है। प्रेम करना और प्रेम चाहना, ये बड़ी अलग बातें हैं। हममें से अधिक लोग बच्चे ही रहकर मर
जाते हैं। क्योंकि हरेक आदमी प्रेम चाहता है। प्रेम करना बड़ी अदभुत बात है। प्रेम चाहना बिलकुल बच्चों जैसी बात है।
छोटे-छोटे बच्चे प्रेम चाहते हैं। मां उनको प्रेम देती है। फिर वे बड़े होते हैं। वे और लोगों से भी प्रेम चाहते हैं, परिवार उनको
प्रेम देता है। फिर वे और बड़े होते हैं। अगर वे पति हुए, तो अपनी पत्नियों से प्रेम चाहते हैं। अगर वे पत्नियां हुईं, तो वे
अपने पतियों से प्रेम चाहती हैं। और जो भी प्रेम चाहता है, वह दुख झेलता है। क्योंकि प्रेम चाहा नहीं जा सकता, प्रेम
केवल किया जाता है। चाहने में पक्का नहीं है, मिलेगा या नहीं मिलेगा। और जिससे तुम चाह रहे हो, वह भी तुमसे
चाहेगा। तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। दोनों भिखारी मिल जाएंगे और भीख मांगेंगे। दुनिया में जितना पति-पत्नियों का संघर्ष है,
उसका केवल एक ही कारण है कि वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम चाह रहे हैं और देने में कोई भी समर्थ नहीं है।
इसे थोड़ा विचार करके देखना आप अपने मन के भीतर। आपकी आकांक्षा प्रेम चाहने की है हमेशा। चाहते हैं, कोई प्रेम करे।
और जब कोई प्रेम करता है, तो अच्छा लगता है। लेकिन आपको पता नहीं है, वह दूसरा भी प्रेम करना केवल वैसे ही है
जैसे कि कोई मछलियों को मारने वाला आटा फेंकता है। आटा वह मछलियों के लिए नहीं फेंक रहा है। आटा वह मछलियों को
फांसने के लिए फेंक रहा है। वह आटा मछलियों को दे नहीं रहा है, वह मछलियों को चाहता है, इसलिए आटा फेंक रहा है।
इस दुनिया में जितने लोग प्रेम करते हुए दिखायी पड़ते हैं, वे केवल प्रेम पाना चाहने के लिए आटा फेंक रहे हैं। थोड़ी देर वे
आटा खिलाएंगे, फिर...।
और दूसरा व्यक्ति भी जो उनमें उत्सुक होगा, वह इसलिए उत्सुक होगा कि शायद इस आदमी से प्रेम मिलेगा। वह भी थोड़ा
प्रेम प्रदर्शित करेगा। थोड़ी देर बाद पता चलेगा, वे दोनों भिखमंगे हैं और भूल में थे; एक-दूसरे को बादशाह समझ रहे थे!
और थोड़ी देर बाद उनको पता चलेगा कि कोई किसी को प्रेम नहीं दे रहा है और तब संघर्ष की शुरुआत हो जाएगी।
दुनिया में दाम्पत्य जीवन नर्क बना हुआ है, क्योंकि हम सब प्रेम मांगते हैं, देना कोई भी जानता नहीं है। सारे झगड़े के
पीछे बुनियादी कारण इतना ही है। और कितना ही परिवर्तन हो, किसी तरह के विवाह हों, किसी तरह की समाज व्यवस्था
बने, जब तक जो मैं कह रहा हूं अगर नहीं होगा, तो दुनिया में स्त्री और पुरुषों के संबंध अच्छे नहीं हो सकते। उनके अच्छे
होने का एक ही रास्ता है कि हम यह समझें कि प्रेम दिया जाता है, प्रेम मांगा नहीं जाता, सिर्फ दिया जाता है। जो मिलता
है, वह प्रसाद है, वह उसका मूल्य नहीं है। प्रेम दिया जाता है। जो मिलता है, वह उसका प्रसाद है, वह उसका मूल्य
नहीं है। नहीं मिलेगा, तो भी देने वाले का आनंद होगा कि उसने दिया।
अगर पति-पत्नी एक-दूसरे को प्रेम देना शुरू कर दें और मांगना बंद कर दें, तो जीवन स्वर्ग बन सकता है। और जितना वे
प्रेम देंगे और मांगना बंद कर देंगे, उतना ही--अदभुत जगत की व्यवस्था है--उन्हें प्रेम मिलेगा। और उतना ही वे अदभुत
अनुभव करेंगे--जितना वे प्रेम देंगे, उतना ही सेक्स उनका विलीन होता चला जाएगा।
Thursday, November 12, 2009
झूठी मुस्कराहट
व्यक्ति मुस्कराहटों के बिना नहीं जी सकता, इसलिये उसे ढोंग करना पड़ता है, लेकिन एक झूठी मुस्कराहट बहुत पीड़ा दे जाती है… यह हमें प्रसन्न नहीं करती, यह सिर्फ हमें यह स्मरण दिलाती है कि हम कितने दुखी हैं।
Tuesday, October 13, 2009
स्वार्थी बनो और देखो
हमें दूसरों को प्रेम करने के बारे में तो मालूम है, परंतु स्वयं को? क्या वह दूसरे का काम है? ओशो का स्पष्ट उत्तर है,'नहीं'; प्रेम तुमसे ही शुरू होता है और स्वयं से प्रेम करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि तुम कौन हो।
स्वार्थ शब्द का अर्थ समझते हो? शब्द बड़ा प्यारा है, लेकिन गलत हाथों में पड़ गया है। स्वार्थ का अर्थ होता है--आत्मार्थ। अपना सुख, स्व का अर्थ। तो मैं तो स्वार्थ शब्द में कोई बुराई नहीं देखता। मैं तो बिलकुल पक्ष में हूं। मैं तो कहता हूं, धर्म का अर्थ ही स्वार्थ है। क्योंकि धर्म का अर्थ स्वभाव है।
और एक बात खयाल रखना कि जिसने स्वार्थ साध लिया, उससे परार्थ सधता है। जिससे स्वार्थ ही न सधा, उससे परार्थ कैसे सधेगा! जो अपना न हुआ, वह किसी और का कैसे होगा! जो अपने को सुख न दे सका, वह किसको सुख दे सकेगा! इसके पहले कि तुम दूसरों को प्रेम करो, मैं तुम्हें कहता हूं, अपने को प्रेम करो। इसके पहले कि तुम दूसरों के जीवन में सुख की कोई हवा ला सको, कम से कम अपने जीवन में तो हवा ले आओ। इसके पहले कि दूसरे के अंधेरे जीवन में प्रकाश की किरण उतार सको, कम से कम अपने अंधेरे में तो प्रकाश को निमंत्रित करो। इसको स्वार्थ कहते हो! चलो स्वार्थ ही सही, शब्द से क्या फर्क पड़ता है! लेकिन यह स्वार्थ बिलकुल जरूरी है। यह दुनिया ज्यादा सुखी हो जाए, अगर लोग ठीक अर्थों में स्वार्थी हो जाएं।
और जिस आदमी ने अपना सुख नहीं जाना, वह जब दूसरे को सुख देने की कोशिश में लग जाता है तो बड़े खतरे होते हैं। उसे पहले तो पता नहीं कि सुख क्या है? वह जबर्दस्ती दूसरे पर सुख थोपने लगता है, जिस सुख का उसे भी अनुभव नहीं हुआ। तो करेगा क्या? वही करेगा जो उसके जीवन में हुआ है।
समझो कि तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हें एक तरह की शिक्षा दी--तुम मुसलमान-घर में पैदा हुए, कि हिंदू-घर में पैदा हुए, कि जैन-घर में, तुम्हारे मां-बाप ने जल्दी से तुम्हें जैन, हिंदू या मुसलमान बना दिया। उन्होंने यह सोचा ही नहीं कि उनके जैन होने से, हिंदू होने से उन्हें सुख मिला है? नहीं, वे एकदम तुम्हें सुख देने में लग गए। तुम्हें हिंदू बना दिया, मुसलमान बना दिया। तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हें धन की दौड़ में लगा दिया। उन्होंने यह सोचा भी नहीं एक भी बार कि हम धन की दौड़ में जीवनभर दौड़े, हमें धन मिला है? धन से सुख मिला है? उन्होंने जो किया था, वही तुम्हें सिखा दिया। उनकी भी मजबूरी है, और कुछ सिखाएंगे भी क्या? जो हम सीखे होते हैं उसी की शिक्षा दे सकते हैं। उन्होंने अपनी सारी बीमारियां तुम्हें सौंप दीं। तुम्हारी धरोहर बस इतनी ही है। उनके मां-बाप उन्हें सौंप गए थे बीमारियां, वे तुम्हें सौंप गए, तुम अपने बच्चों को सौंप जाओगे।
कुछ स्वार्थ कर लो, कुछ सुख पा लो, ताकि उतना तुम अपने बच्चों को दे सको, उतना तुम अपने पड़ोसियों को दे सको। यहां हर आदमी दूसरे को सुखी करने में लगा है, और यहां कोई सुखी है नहीं। जो स्वाद तुम्हें नहीं मिला, उस स्वाद को तुम दूसरे को कैसे दे सकोगे? असंभव है।
मैं तो बिलकुल स्वार्थ के पक्ष में हूं। मैं तो कहता हूं, मजहब मतलब की बात है। इससे बड़ा कोई मतलब नहीं है। धर्म यानी स्वार्थ। लेकिन बड़ी अपूर्व घटना घटती है, स्वार्थ की ही बुनियाद पर परार्थ का मंदिर खड़ा होता है।
तुम जब धीरे-धीरे अपने जीवन में शांति, सुख, आनंद की झलकें पाने लगते हो, तो अनायास ही तुम्हारा जीवन दूसरों के लिए उपदेश हो जाता है। तुम्हारे जीवन से दूसरों को इंगित और इशारे मिलने लगते हैं। तुम अपने बच्चों को वही सिखाओगे जिससे तुमने शांति जानी। तुम फिर प्रतिस्पर्धा न सिखाओगे, प्रतियोगिता न सिखाओगे, संघर्ष-वैमनस्य न सिखाओगे। तुम उनके मन में जहर न डालोगे।
इस दुनिया में अगर लोग थोड़े स्वार्थी हो जाएं तो बड़ा परार्थ हो जाए।
अब तुम कहते हो कि 'क्या ऐसी स्थिति में ध्यान आदि करना निपट स्वार्थ नहीं है?'
निपट स्वार्थ है। लेकिन स्वार्थ में कहीं भी कुछ बुरा नहीं है। अभी तक तुमने जिसको स्वार्थ समझा है, उसमें स्वार्थ भी नहीं है। तुम कहते हो, धन कमाएंगे, इसमें स्वार्थ है; पद पा लेंगे, इसमें स्वार्थ है; बड़ा भवन बनाएंगे, इसमें स्वार्थ है। मैं तुमसे कहता हूं, इसमें स्वार्थ कुछ भी नहीं है। मकान बन जाएगा, पद भी मिल जाएगा, धन भी कमा लिया जाएगा--अगर पागल हुए तो सब हो जाएगा जो तुम करना चाहते हो--मगर स्वार्थ हल नहीं होगा। क्योंकि सुख न मिलेगा। और स्वयं का मिलन भी नहीं होगा। और न जीवन में कोई अर्थवत्ता आएगी। तुम्हारा जीवन व्यर्थ ही रहेगा, कोरा, जिसमें कभी कोई वर्षा नहीं हुई। जहां कभी कोई अंकुर नहीं फूटे, कभी कोई हरियाली नहीं और कभी कोई फूल नहीं आए। तुम्हारी वीणा ऐसी ही पड़ी रह जाएगी, जिसमें कभी किसी ने तार नहीं छेड़े। कहां का अर्थ और कहां का स्व!
तुमने जिसको स्वार्थ समझा है, उसमें स्वार्थ नहीं है, सिर्फ मूढ़ता है। और जिसको तुम स्वार्थ कहकर कहते हो कि कैसे मैं करूं? मैं तुमसे कहता हूं, उसमें स्वार्थ है और परम समझदारी का कदम भी है। तुम यह स्वार्थ करो।
इस बात को तुम जीवन के गणित का बहुत आधारभूत नियम मान लो कि अगर तुम चाहते हो दुनिया भली हो, तो अपने से शुरू कर दो--तुम भले हो जाओ।
फिर तुम कहते हो, 'परमात्मा मुझे यदि मिले भी, तो उससे अपनी शांति मांगने के बजाय मैं उन लोगों के लिए दंड ही मांगना पसंद करूंगा जिनके कारण संसार में शोषण है, दुख है और अन्याय है।'
क्या तुम सोचते हो तुम उन लोगों में सम्मिलित नहीं हो? क्या तुम सोचते हो वे लोग कोई और लोग हैं? तुम उन लोगों से भी तो पूछो कभी! वे भी यही कहते हुए पाए जाएंगे कि दूसरों के कारण। कौन है दूसरा यहां? किसकी बात कर रहे हो? किसको दंड दिलवाओगे? तुमने शोषण नहीं किया है? तुमने दूसरे को नहीं सताया है? तुम दूसरे की छाती पर नहीं बैठ गए हो, मालिक नहीं बन गए हो? तुमने दूसरों को नहीं दबाया है? तुमने वही सब किया है, मात्रा में भले भेद हों। हो सकता है तुम्हारे शोषण की प्रक्रिया बहुत छोटे दायरे में चलती हो, लेकिन चलती है। तुम जी न सकोगे। तुम अपने से नीचे के आदमी को उसी तरह सता रहे हो जिस तरह तुम्हारे ऊपर का आदमी तुम्हें सता रहा है। यह सारा जाल जीवन का शोषण का जाल है, इसमें तुम एकदम बाहर नहीं हो, दंड किसके लिए मांगोगे?
और जरा खयाल करना, दंड भी तो दुख ही देगा दूसरों को! तो तुम दूसरों को दुखी ही देखना चाहते हो! परमात्मा भी मिल जाएगा तो भी तुम मांगोगे दंड ही! दूसरों को दुख देने का उपाय ही! तुम अपनी शांति तक छोड़ने को तैयार हो!
Saturday, August 29, 2009
Ab Ke Hum Bichhray To Shayad
Ab Ke Hum Bichhray To Shayad Kabhi Khwabon Mein Milen
Jis Tarah Sookhay Hue Phool Kitabon Mein Milen
Dhoond Ujray Hue Logon Mein Wafa K Moti
Ye Khazanay Tujhe Mumkin Hai Kharabon Mein Milen
Gham-E-Duniya Bhi Gham-E-Yaar Mein Shaamil Kar Lo
Nasha Barhta Hai Shar?ben Jo Shar?bon Mein Milen
Tu Khuda Hai Na Mera Ishq Farishton Jaisa
Dono Insaan Hain To Kyun Itnay Hijaabon Mein Milen
Aaj Hum Daar Pe Khenchay Gaye Jin Baaton Par
Kya Ajab, Kal Vo Zamaanay Ko Nisaabon Mein Milen
Ab Na Vo Main Hun, Na Tu Hai, Na Vo Maazi Hai Faraz
Jaise Do Shakhs Tamanna K Saraabon Mein Milen
Saturday, August 22, 2009
आज की दुनिया
लगा मुझको कहीं पर मैंने इसकी शक्ल है देखी ,
कि देखा ध्यान से उसको तो मेरी अक्ल चकराई ,
पड़ा जो राह में वो तो ख़ुद मैं ही हूँ भाई ,
न जाने कब कहा कैसे किधर को चल बसा था मैं ,
कई लोगों के बीच देखो आज आ के फंसा था मैं ,
कि मुझको देख कर सब लोग कुछ तो थे बोले ,
कई ने कुछ तो कई ने मेरे सारे राज थे खोले ,
कि मुझको देख कर एक यार बुक्के फाड़ के रोया ,
मैं समझा कि चलो ये ही मेरा एक यार है गोया ,
मगर वो था फरेबी दुष्ट और था महा पापी ,
वो बोला देख कर मुझको कि कुछ दिन बाद मर जाते ,
जो पैसे कल ही ले गए थे वो तो कुछ खर्च कर जाते ,
जो भी कर्जा लिया था तूने वो तुझको माफ़ करता हूँ ,
ये घड़ी , अंगूठी और चेन लेकर मैं हिसाब साफ़ करता हूँ ,
कि देख कर जेबों के पैसों को मेरे एक यार ये बोले ,
कि हाय छोड़ कर वादा अधूरा मर गया भोले ,
कि इन पैसों से आज तुझे मेरा वादा निभाना था ,
पहले सनीमा फ़िर कलब फ़िर बार जाना था ,
कि चल तेरी खातिर मैं तेरा वादा निभाऊंगा ,
कि तेरे नाम की दारु भी मैं ख़ुद ही चढाऊंगा ,
कि ये कह कर उन्होंने जेबों के सारे पैसे थे मारे ,
हम तो बस ये ही सोंचा किए क्या येही दोस्त थे सारे ,
"अभि" देखो जहाँ में आज तो बस ये ही ये अब है ,
नही इन्सान की कीमत यहाँ तो लाश ही सब है ।
तजुर्बा
लोग इतना कहे आदमी अच्छा न था !
लोग इस अंदाज में देते है दुनिया कि मिसाल,
मै तो जैसे तजुरबो के दौर से गुजरा न था !
Sunday, June 28, 2009
पिता
पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं , पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं ॥
अपने पापा को बेटी (दिव्यांशी)की तरफ़ से ......
Thursday, May 28, 2009
रिश्ता
मोती का जो सीप से ,
वही रिश्ता , मेरा , तुम से !
प्रणय का जो मीत से ,
स्वरों का जो गीत से ,
वही रिश्ता मेरा , तुम से !
गुलाब का जो इत्र से ,
तूलिका का जो चित्र से ,
वही रिश्ता मेरा , तुम से !
सागर का जो नैय्या से ,
पीपल का जो छैय्याँ से ,
वही रिश्ता मेरा , तुम से !
पुष्प का जो पराग से ,
कुमकुम का जो सुहाग से ,
वही रिश्ता मेरा , तुम से !
नेह का जो नयन से , डाह का जो जलन से ,
वही रिश्ता मेरा , तुम से !
दीनता का शरण से ,
काल का जो मरण से ,
वही रिश्ता मेरा तुमसे......
Thursday, May 7, 2009
बस ऐसे ही
मेरा प्यार था सच्चा कोई धोखा न था ।
एक लम्हें में वो हमसे रिश्ता तोड़ लेंगे ।
ख्वाब में भी हमने कभी ये सोंचा न था ।
भुला दिया उसने एक पल में मुझे ,
जिसकी याद में मैं रात भर सोता न था ।
पलकों की नमी अब जाती ही नही ,
सब कहते हैं पहले तो मैं कभी रोता न था ।
तौलते हैं दौलत से हर रिश्ते को आज ,
पर पहले तो ऐसा कभी होता न था ।
गैरों के गम में भी हुआ मैं शरीक ,
पर मेरे अश्कों को तो अपनों ने भी पोछा न था ।
लोगों ने क्योँ उजाड़ दिया चमन मेरा ,
मैंने किसी के आँगन का सुमन नोचा न था ॥
