Friday, February 13, 2009

हम तो बचपन में भी अकेले थे

हम तो बचपन में भी अकेले थे सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे
एक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के एक तरफ़ आँसूओं के रेले थे
थीं सजी हसरतें दूकानों पर ज़िन्दगी के अजीब मेले थे
आज ज़ेहन-ओ-दिल भूखों मरते हैं उन दिनों फ़ाके भी हमने झेले थे
ख़ुदकुशी क्या ग़मों का हल बनती मौत के अपने भी सौ झमेले थे

हर ख़ुशी में कोई कमी सी है

हर ख़ुशी में कोई कमी सी है हँसती आँखों में भी नमी सी है
दिन भी चुप चाप सर झुकाये था रात की नफ़्ज़ भी थमी सी है
किसको समझायेँ किसकी बात नहीं ज़हन और दिल में फिर ठनी सी है
ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई गर्द इन पलकों पे जमी सी है
कह गए हम किससे दिल की बात शहर में एक सनसनी सी है
हसरतें राख हो गईं लेकिन आग अब भी कहीं दबी सी है

वफ़ा

यार तन्हाई से डरोगे तो मर जाओगे ,
प्यार इस दुनिया मैं कहीं न पाओगे ।
.........................................................
भागोगे कितना दूर तुम इस तन्हाई से ,
ऊब जाओगे इस दुनिया की बेवफाई से ।
.........................................................
कर लो इससे यारी ये वफ़ा दिखायेगी ,
हर वक्त हर कहीं ये साथ निभाएगी ।
.........................................................
जब कभी गम और परेशानियाँ घेरेंगी तुम्हें ,
रख के सर तेरा अपनी गोद में प्यार से सहलाएगी ।
.........................................................
जब कभी चाहो इसे आवाज देकर देखना ,
ये कभी माँ कभी बहन तो कभी प्रेमिका बन आएगी ।
.........................................................
वफ़ा होती है क्या न इससे ज्यादा कोई बताएगा ,
जायेगी साथ तेरे अगर उस जहाँ में "अभी" तू जाएगा ॥
............................................................

Thursday, February 12, 2009

मुक्तक

गिरने वालों पर हँसता है ...
ख़ुद फिसलन पर खड़ा हुआ .....
..............
मैंने सोंचा था यह मंजर ...
देख के वो डर जाएगा ......
...............

परछाईं

तन्हा रहो तो जानो की तन्हाईयाँ क्या कहती हैं ,
कभी सहा होगा न इतना - गम ये सहती हैं ।
.......................................................................
कभी देखो तो इन वीरानों को - कभी देखो तो इन बेगानों को ,
कभी ये भी अपने हुआ करते थे - जाते क़दमों की आहटें ये कहती हैं ।
.......................................................................
आज फ़िर मैंने ग़मों को दुखी देखा - दूर दूर तक न थी कहीं कोई खुशी देखा ,
यहीं शायद कहीं वो खोया था - उसकी मिटती हुई परछाइयाँ ये कहती हैं ।
.......................................................................
रुका था वहां पर उसे ढूँढा भी बहुत था - पर वो आता ही कैसे जो इस जहाँ में ही नही था ,
चल कहीं और चलें अब वो न आएगा - दूर दूर तक फैली तन्हाईयाँ ये कहती हैं ।
.......................................................................

Tuesday, February 10, 2009

दीवानगी

तन्हाई में ऐ सनम तुम हमको बहुत तड़पाते हो ,
बैठे रहते हो दूर तमाशाई बनके मेरे पास नही आते हो ।
..................................................................................
कहते हैं सब की हो गया हूँ मैं तेरा दीवाना,
ये तो सिर्फ़ जानता हूँ मैं की क्या है तेरा फ़साना ।
..................................................................................
जब भी आती है तेरी याद बंद हो जाती हैं ये आँखें ,
रोकता हूँ बहुत पर बोल देती हैं सब ये उखड़ी सांसें ।
...................................................................................
हम जानते हैं की बिन हमारे तन्हा तुम भी न रह पाओगी ,
अगर हुई मिलने की कसक तो भागे चले आओगे ....भागे चले आओगे ........

जज्बात

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,तुम कह देना कोई ख़ास नहीं ।
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,एक झूठ है आधा सच्चा सा ।
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,एक बहाना है अच्छा अच्छा सा ।
जीवन का एक ऐसा साथी है ,जो दूर हो के पास नहीं ।
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,तुम कह देना कोई ख़ास नहीं ।
हवा का एक सुहाना झोंका है ,कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा ।
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,कभी अपना तो कभी बेगानों सा ।
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं ।
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,तुम कह देना कोई ख़ास नहीं ।
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है ।
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है ।
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं ।
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,तुम कह देना कोई ख़ास नहीं