Thursday, April 16, 2009

इन्सान और जिंदगी

चलते - चलते थक गया , एक पल को ही रुक जाऊँ मैं,
ना रास्ता न मंजिलें , जाऊं तो किधर जाऊं मैं ।
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हर रास्ता है कह रहा, की आ मेरे तू साथ चल,
हैं नये सफर नई मंजिलें, तू दिल ले नई आस चल।
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गर यूँ ही तू थकता रहा, या ऐसे रुकता ही गया,
तो एक दिन इस भीड़ में, तू खो के ही रह जाएगा ।
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गर हो न मंजिल रास्ते , तो भी कोई तू गम न कर ,
तू ख़ुद बना ले रास्ते , और ख़ुद ही मंजिल भी बना ।
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ना सोंच की हूँ थक गया , ना सोंच की रुक जाऊं मैं ,
ये सोंच की चलता रहूँ , कोई तो मंजिल पाऊँ मैं ।
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Tuesday, April 7, 2009

बेवफा

देख डसती है मुझे फ़िर आज ये तनहाइयाँ ,
हो चुकी है आज तक मेरी बहुत रुस्वाइयां ।
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साथ तेरा छोड़ा है कि जा तुझे खुशियाँ मिलें ,
दूर ही मुझसे सही पर तुझको नई दुनिया मिलें ।
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मेरी इस दुनिया में सिवा विरानगी के कुछ नही ,
तेरी दुनिया में कहीं कुछ फूल खुशियों के खिले ।
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बेवफा समझे मुझे तू यार इसका गम नही ,
तेरी खुशियाँ ऐ सनम मेरे लिए कुछ कम नहीं ॥
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Saturday, April 4, 2009

उसका यूं ही चले जाना किसी मौत से कम नहीं था

ये रचना प्रशांत जी की है मुझे बहुत पसंद आई इस लिए मैंने इसे अपने पास अपनी पसंद मैं संरछित कर लिया .....

वो कब इस जीवन में आयी और कब चली गई कुछ पता ही नहीं चला॥ ऐसा लगता है जैसे जीवन के पांच साल यूं ही हवा में उड़ गये.. जीवन के सबसे खुशनुमा पांच साल.. उसकी कमी आज भी खलती है.. मन उदास भी होता है.. उसके वापस आने की कल्पना भी करता हूं.. मगर उसे पाने की कामना नहीं करता हूं.. उसके साथ जीवन के कयी खूबसूरत रंग देखे थे.. किसी के प्यार में आना क्या होता है यह भी उसका साथ पाकर ही जाना था.. उस प्यार का पागलपन.. उस प्यार की गहराई.. उस प्यार का अंधापन.. उस प्यार का दर्द.. वहीं उसके यूं ही चले जाने के बाद ही यह भी जाना की जिसे अंतर्मन से आप चाहते हैं और उसके बिना एक पल भी गुजारने का ख्याल भी डरा जाता हो, उसके अचानक यूं ही चले जाना.. बिना कुछ कहे.. बिना कोई कारण बताये.. शायद किसी अपने की मौत भी तो यूं ही होती है.. कहने को कई बातें होती है.. जिन बातों पर बहस होती थी उन्ही बातों को फिर से सुनने के लिये कान तरस जाते हैं.. अपनी भूल के लिये आप माफी मांगना चाहते हैं.. मगर कुछ कर नहीं सकते.. बस एक छटपटाहट अंदर तक रह जाती है जो अनगिनत रातें आपको पागलों कि तरह जगाती है.. तुम्हारे जाने से दुनिया को एक अलग नजरीये से भी देखा.. कई बुराईयां जिनसे दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था, उन्हें भी अपना लिया.. मगर शायद पहले से अच्छा इंसान हो गया.. लेकिन उससे क्या तुम्हारी कमी पूरी हो गई? मुझे पता है कि उत्तर तुम नहीं दोगी.. यहां जो नहीं हो.. मगर क्या यहां होने पर भी उत्तर देती? नहीं.. उत्तर हम दोनों को ही पता है.. नहीं.. क्यों चली गई तुम यह सवाल आज भी अंदर तक मुझे खाता है.. उस बेचैनी को धुंवे तले छिपाने की नाकाम कोशिशें भी करता हूं.. अक्सर कईयों से यह सुना है कि जब उदास हो तो उन पुरानी यादों को याद करना चाहिये जब हम बेवजह खुश हुआ करते थे.. मगर मैं किन यादों को याद करूं? सभी बेवजह की खुशियां भी तो तुमसे ही थी, जिन्हें तुम साथ ले गई.. हां! शायद दुनिया के लिये तुम हो इसी दुनिया में कहीं, मगर मेरे लिये तो तुम्हारा यूं ही चले जाना किसी मौत से कम नहीं है..


Monday, March 23, 2009

परछाइयां

वह अंधेरे से लिपट कर रात भर रोता रहा ,
बेरहम सूरज न जाने किस जगह सोता रहा ।
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यह न समझा साथ उसका छोड़ देंगी एक दिन ,
वह सुबह से शाम तक परछाइयां ढोता रहा ।
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ये बुझे तारे बगावत कर नही सकते कभी ,
सत्य है होगा वही जो आज तक होता रहा ।
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एक उल्का सी ह्रदय में रह गई है रोशनी ,
बस उसी सुख की लहर में ख़ुद बा ख़ुद खोता रहा ।
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आइना भी कह न पाया रोक ले आंसू "अभी "
वह अभागा मोतियों को धूल में बोता रहा ।
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Friday, March 20, 2009

आस

बीते जो चन्द रोज़ मुझे होश संभाले ,
पीने पड़े मुझे जाने कितने जहर के प्याले ।
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सीखा ही था जब मैंने गिर - गिर के संभलना,
वो पाई ठोकरें की हुआ मुश्किल मेरा चलना ।
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था सामने एक बच्चा जो कुछ खेल रहा था ,
उस उम्र में भी मैं बड़े दुःख झेल रहा था ।
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बीता है बचपन मेरा अब आई है जवानी ,
सोंचता हूँ की होगी कब ये ख़त्म कहानी ।
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हूँ आज परेशान पर ये आस न छोड़ी ,
वो देगा मुझे जरूर खुशी चाहे दे थोडी ।
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Thursday, March 5, 2009

इल्तजा

इन तन्हाईयों से दूर , मुझे ले के कहीं चल ,
मेरी परछाइयों से दूर , मुझे ले के कहीं चल ।
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चल दूर कहीं इतना , कि फ़िर लौट न पाऊं ,
न रास्ते हो ख़त्म , न मंजिल को मैं पाऊँ ।
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न हो वफ़ा कि चाह , न हो प्यार कि हसरत ,
चलता ही जा रहा हूँ , बस चलता ही मैं जाऊं ।
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ऐ जिंदगी सुन इल्तजा , ना साथ छोड़ देना ,
जब भी उठे नजर ,तुझे साथ में मैं पाऊँ ।
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Sunday, March 1, 2009

इंतजार

कर रहा हूँ मैं कब से तेरा इंतजार ,

आजा कि न आयेंगे ये दिन बार बार ।

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आजा के फिजा में फ़िर ये बहार ना आएगी ,

लाख तड़पेगी तू पर मेरी परछाई भी न पायेगी ।

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मैं अपनी सारी यादें अपने साथ ले जाऊंगा ,

यूँ करूंगा तन्हा कि फ़िर कभी न आऊंगा ।

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आजा कि इंतजार की इन्तहा हो गई है ,

यूँ लगे हर पल कि जिस्म से जान जुदा हो गई है ।

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